अनुबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा

अनुबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा

अनुबन्ध (Contract) शब्द की उत्पति लेटिन शब्द कॉन्ट्रैक्टम (Contracturm) से हुई है, जिसका अर्थ है 'आपस में मिलाना' । सामान्य शब्दों में अनुबन्ध से आशय दो या अधिक व्यक्तियों को किसी कार्य को करने अथवा न करने हेतु आपस में मिलाने वाले समझौते अथवा ठहराव से है। वैधानिक दृष्टिकोण से अनुबन्ध का अर्थ विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है। अनुबन्ध की प्रमुख परिभाषायें निम्न प्रकार है :

(1) न्यायाधीश सालमण्ड (Salmond) के अनुसार, अनुबन्ध एक ऐसा ठहराव है जो पक्षकारों के बीच दायित्व उत्पन्न करता हैऔर उनकी व्याख्या करता है।

इस परिभाषा का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि अनुबन्ध में दो या अधिक पक्षकार होते हैं ; पक्षकारों के बीच एक ठहराव या समझौता होता है; इस ठहराव से पक्षकारों के मध्य दायित्व उत्पन्न होता है और यह ठहराव पक्षकारों के दायित्वों की व्याख्या करता है।

(2) सर विलियम एन्सन (Sir William Anson) के अनुसार, अनुबन्ध दो या दो से अधिक पक्षकारों के बीच किया गया ऐसा ठहराव है जिसको राजनियम द्वारा प्रवर्तित कराया जा सकता है तथा जिसके अन्तर्गत एक या अधिक पक्षकारों को दूसरे पक्षकार या पक्षकारों के विरुद्ध कुछ अधिकार प्राप्त हो जाते हैं।

सर विलियम एन्सन की परिभाषा की व्याख्या करने से स्पष्ट होता है कि अनुबन्ध एक ठहराव होता है जिसमें दो या दो से अधिक पक्षकार होते हैं और यह ठहराव राजनियम के प्रावधानों के अधीन प्रवर्तनीय कराया जाता है। इस ठहराव के आधीन पक्षकारों को किसी कार्य को करने अथवा न करने के बारे में , एक दूसरे के विरुद्ध कुछ वैधानिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

(3) लीक (Leake) के अनुसार अनुबन्ध 'वैधानिक अनुबन्ध' होने की दृष्टि से ऐसा ठहराव है जिसकेद्वारा एक पक्षकार कुछ निष्पादन करने के लिए बाध्य होगा और जिसको प्रवर्तित करानेका दूसरे पक्षकार को वैधानिक अधिकार होगा।

लीक द्वारा दी गयी परिभाषा से स्पष्ट होता हैकि अनुबन्ध एक ठहराव है जो वैधानिक आधार पर किया जाता है और उसकेदो पक्षकार होते हैं। इस ठहराव के अनुसार एक पक्षकार निश्चित दायित्व का निष्पादन करने के लिए बाध्य होता है और दूसरेपक्षकार को यह वैधानिक अधिकार होता है कि वह पहलेपक्षकार से उसके दायित्व का निष्पादन करा सके।

(4) लार्ड हाल्सबरी (Lord Halsbury) के अनुसार, अनुबन्ध दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच एक ठहराव है जो राजनियम द्वारा प्रवर्तित कराने के उद्देश्य से किया जाता है और जिसका निर्माण एक पक्षकार द्वारा किसी कार्य को करने अथवा करने से दूर रहने के दूसरे पक्षकार के प्रस्ताव की स्वीकृति देने के परिणामस्वरुप होता है।

इस परिभाषा में बतलाया गया है कि अनुबन्ध दो या दो से अधिक पक्षकारों के बीच किया गया एक ठहराव होता है जो कानून द्वारा प्रवर्तित कराने के उद्देश्य से किया जाता है। अनुबन्ध का निर्माण एक पक्षकार द्वारा किसी कार्य को करने अथवा न करने के बारे में प्रस्ताव करने तथा दूसरे पक्षकार द्वारा उस प्रस्ताव को स्वीकार करने के परिणामस्वरुप होता है।

(5) सर फ्रेडरिक पोलक (Sir Fredrick Pollock) के अनुसार, प्रत्येक ठहराव एवं वचन जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय हो, अनुबन्ध होता है।

सर फ्रेडरिक पोलक द्वारा दी गयी परिभाषा संक्षिप्त एवं पूर्ण है। इस परिभाषा में सार रुप में यह कहा गया है कि जो ठहराव राजनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रवर्तनीय कराया जा सकता है, वही अनुबन्ध हो सकता है।

(6) भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 2 (h) के अनुसार, “अनुबन्ध एक ऐसा ठहराव है, जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होता है।

यह परिभाषा भी संक्षिप्त किन्तु पूर्ण है जिसके अन्तर्गत कहा गया है कि अनुबन्ध बनने के लिए किसी ठहराव का राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय होना आवश्यक है। जो ठहराव राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय नही होता है, वह अनुबन्ध नही बन सकता है।

सर फ्रेडरिक पोलक एवं भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 2 (h) मे दी गयी परिभाषाओं का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि अनुबन्ध के निर्माण करने के लिए दो बातों का होना आवश्यक है: प्रथम, पक्षकारों के बीच ठहराव अथवा समझौते का होना, तथा द्वितीय, उस ठहराव या समझौते का राजनियम द्वारा लागू होना । अब प्रश्न यह उठता है कि एक ठहराव को राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय कब कराया जा सकता है? भारतीय अनुबन्ध अधिनियम की धारा 10 में उन सभी लक्षणों को बताया गया है, जो एक ठहराव को राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय कराने के लिए आवश्यक होते हैं । इस धारा के अनुसार, “सभी ठहराव अनुबन्ध है, यदि वे उन पक्षकारों की स्वतन्त्र सहमति से किये जाते हैं , जिनमें अनुबन्ध करने की क्षमता है, जी वैधानिक प्रतिफल के लिए तथा वैधानिक उद्देश्य से किये जाते हैं और जो इस अधिनियम द्वारा स्पष्ट रुप से व्यर्थ घोषित नही किये गये हैं । इसके अतिरिक्त यदि भारत में प्रचलित किसी विशेष राजनियम द्वारा अनिवार्य हो तो ठहराव लिखित हो, अथवा साक्षियों द्वारा प्रमाणित हो अथवा रजिस्टर्ड हो।

उपर्युक्त वर्णित सभी परिभाषाओं के विवेचन के पश्चात् हम कह सकते हैं कि अनुबन्ध से आशय उस ठहराव से है जो राजनियम द्वारा प्रवर्तनीय कराया जा सकता है और जिसके अन्तर्गत एक पक्षकार का किसी काम को करने अथवा न करने के लिए वैधानिक दायित्व उत्पन्न होता है तथा दूसरे पक्षकार को पहले पक्षकार के विरुद्ध वैधानिक अधिकार प्राप्त होते।