कमजोर नींव पर शिक्षा की इमारत

कमजोर नींव पर शिक्षा की इमारत

स्वस्थ व सफल शिक्षा व्यवस्था के लिए मजबूत प्राथमिक शिक्षा रूपी नींव आवश्यक है. वर्तमान में प्राथमिक शिक्षा मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित है.

सरकार संचालित विद्यालय प्रणाली और निजी विद्यालय प्रणाली. कुछ दशक पूर्व तक सरकारी विद्यालय ही प्राथमिक शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, परंतु निजीकरण एवं व्यावसायीकरण के साथ शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से परिवर्तन हुआ है. अधिकांश सरकारी विद्यालय अनेक खामियों, जैसे भवन व अन्य जरूरी सुविधाओं के अभाव, शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों की कमी, शिक्षकों के विविध सरकारी कार्यों में व्यस्त रहने के कारण शिक्षण में उदासीनता आदि से ग्रस्त रहे हैं. निजी विद्यालयों ने काफी हद तक इन्हें दूरकर बेहतर विकल्प प्रस्तुत किया है. 

निजी विद्यालयों ने धनी व मध्यम वर्ग के अधिक से अधिक छात्रों को आकर्षित करने के लिए नीतियां विकसित की हैं. सरकारी विद्यालयों में जहां पांच वर्ष की आयु में कक्षा-1 में प्रवेश मिलता है, निजी विद्यालयों ने तीन वर्ष की आयु में नर्सरी में प्रवेश की परंपरा डाली. छात्र तीन वर्षो में प्रारंभिक कक्षाओं में अध्ययन कर कक्षा-1 में पहुंच जाते हैं. अधिकांश निजी विद्यालयों में शिक्षा का अंग्रेजी-माध्यम प्रचलित है क्योंकि प्राय: अभिभावक अंग्रेजी-माध्यम की शिक्षा को अधिक आकषर्क व लाभदायक समझकर उसे अधिक महत्व देते हैं. साथ ही निजी विद्यालयों ने शुल्क के रूप में अधिक धन बटोरने के लिए कक्षा-2 से ही कंप्यूटर शिक्षा प्रदान करने की परंपरा डाल दी. इसके अलावा विद्यालयों द्वारा छात्रों को आवागमन के लिए शुल्क-आधारित परिवहन के साधन भी उपलब्ध कराए जाते हैं. इतना ही नहीं, आज महंगी व खर्चीली शिक्षा छात्रों व अविभावकों के लिए सामाजिक स्तर का प्रतीक बन गई है. आजकल बड़े शहरों के अनेक परिवारों में पति-पत्नी दोनों ही बाहर काम पर जाते हैं और प्राय: बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाते. छोटी आयु में ही बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजना उनके लिए अच्छा विकल्प है. इन सभी कारणों से समाज का उच्च व मध्यम वर्ग निजी विद्यालयों की ओर आकर्षित हो गया है.

दूसरी ओर सरकारी विद्यालयों की दशा निरंतर बिगड़ती रही. समुचित भवन व आवश्यक सुविधाओं का अभाव निश्चय ही एक कारण रहा है. शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों की कमी और प्राय: शिक्षकों का विविध सरकारी कर्तव्यों में व्यस्त रहना भी एक बड़ा मुद्दा है. मध्याह्न-भोजन (मिडडे-मील) की व्यवस्था भी शिक्षकों की एक बड़ी जिम्मेदारी है. साथ ही परीक्षा में सफलता की गारंटी से अधिकांश छात्र व अविभावक पढ़ाई के प्रति उदासीन और मध्याह्न भोजन की ओर अधिक केंद्रित होते प्रतीत होते हैं. इन सबके अलावा शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों में बढ़ रही लापरवाही व अनुशासनहीनता एक सामान्य प्रवृत्ति है. यह सभी कारक सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं. 

सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा पर प्राय: चर्चा होती है और सुधार के लिए प्रतिवर्ष भारी धनराशि भी आवंटित की जाती है. लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होता नहीं दिखाई देता. वास्तव में सरकारी विद्यालयों को केवल धन आवंटन और ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं होगा. सुधार के लिए संपूर्ण व्यवस्था की खामियों का पूर्णरूपेण निरीक्षण कर उसमें आमूलचूल सुधार व नियमन की आवश्यकता है. सरकारी विद्यालयों में भवन व आवश्यक सुविधाएं होना चाहिए, साथ ही पर्याप्त संख्या में शिक्षक व अन्य कर्मचारी भी होने चाहिए ताकि समुचित शिक्षक/छात्र अनुपात बना रहे और विद्यालय की ब्यवस्था सुचारु  रूप से चलती रहे. यह भी आवश्यक है कि शिक्षक अपना समय शैक्षणिक कायरे में दे सकें, मध्याह्न-भोजन और विविध सरकारी कायरे के लिए अतिरिक्त स्टाफ नियुक्त किया जा सकता है.

प्राथमिक शिक्षा में एकरूपता की अनिवार्यता एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है जो प्राय: चर्चा में नहीं आता. एकरूपता न होने से ‘सस्ती व महंगी’, ‘ग्रामीण व शहरी’ या ‘निजी विद्यालय-प्रदत्त व सरकारी विद्यालय-प्रदत्त’ शिक्षा के बीच खाई बढ़ती जा रही है और ग्रामीण व निर्धन भारत पिछड़ता जा रहा है. विशेषकर विद्यालय में प्रवेश योग्य न्यूनतम आयु, शैक्षिक पाठ्यक्रम और शिक्षा के माध्यम आदि में एकरूपता होनी अत्यंत आवश्यक है. निजी विद्यालयों में कम आयु में प्रारंभिक कक्षाओं में प्रवेश प्रक्रिया समाप्त होनी चाहिए. शिक्षा का अंग्रेजी-माध्यम अधिकांश छात्रों के लिए अध्ययन में बाधक है, इसलिए शिक्षा का माध्यम ‘राज्य-भाषा’ और/या ‘हिंदी’ होनी चाहिए. पाठ्यक्रम ऐसा हो कि एक सामान्य छात्र, सामान्य सुविधाओं के साथ समुचित प्रयास से सीख सके और अतिरिक्त ट्यूशन की आवश्यकता न पड़े. प्राथमिक शिक्षा में कंप्यूटर शिक्षा महत्वपूर्ण नहीं प्रतीत होती और न ही पूरे देश में एक समान रूप से लागू की जा सकती है. प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को उत्तम नागरिक बनाना है, इसलिए नैतिक शिक्षा, स्वास्थ्य व पर्यावरण आदि पर ध्यान देने की अधिक आवश्यकता है. बचपन अमूल्य है, इसलिए बस्ते का भार कम रखकर बच्चों को बचपन का आनंद लेने का पर्याप्त अवसर देना चाहिए. 

सरकारी विद्यालयों में सुधार व प्राथमिक शिक्षा का नियमन, शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए दो-आयामी रणनीति होनी चाहिए. लेकिन कौन इस विषय पर ध्यान दे, और क्यों, और अब तक ऐसा क्यों नहीं हुआ? उच्च वर्ग, जिसमें अधिकांश नीति-निर्माता भी शामिल हैं, अच्छी तरह से सुसज्जित निजी विद्यालयों को पसंद करते हैं और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की परवाह नहीं करते. सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा और समग्र प्राथमिक शिक्षा-व्यवस्था में अराजकता का भी शायद यही कारण रहा है. 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हाल का निर्णय प्राथमिक शिक्षा प्रणाली में सुधारात्मक कार्रवाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है. न्यायालय ने कहा कि राज्य के अधिकारी, चुने हुए जनप्रतिनिधि, न्यायाधीश तथा वे सभी व्यक्ति जो राज्य सरकार अथवा सार्वजनिक कोष से पोषित हैं, अपने बच्चों का नामांकन राज्य शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित विद्यालयों में करवाएं. साथ ही सरकार को अगले शिक्षा-सत्र से ऐसी व्यवस्था लागू करने और आदेश की अवहेलना करने पर दंड के प्रावधान करने का निर्देश दिया. न्यायालय का यह अद्भुत निर्णय निसंदेह सराहनीय है, परंतु राजनीतिक और नौकरशाही हलकों में इसका गर्मजोशी-युक्त स्वागत दिखाई नहीं देता. यह आश्चर्य की बात है कि प्राय: राजनेतागण स्वयं को दलितों, गरीबों व किसानों का समर्थक, शुभचिंतक व मसीहा बताते हैं. कभी-कभी उनके कष्ट साझा करने व समर्थन प्रदर्शित करने के लिए उनके साथ भोजन करते हैं, उनके गाँव में रात बिताते हैं. और कुछ तो स्वयं को गरीब पृष्ठभूमि से जोड़कर अपने पुराने गरीबी के दिनों की कहानियां सुनाते हैं. परंतु खुलकर गर्मजोशी से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के इस निर्णय की सराहना नहीं करते.

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