घातक है-रेडियोधर्मी प्रदूषण ?

घातक है-रेडियोधर्मी प्रदूषण ?

ज विकास की गति के लिहाज से उर्जा की मॉग लगातार बढ़ती जा रही है।उर्जा के तमाम स्त्रोतों जैसे जल,कोयला,तेल और सौर उर्जा या तो सिकुड़ते जा रहे या फिर पर्यावरणीय दृष्टि से घातक है। ऐसी स्थिति में उर्जा की आपूर्ति की सततता के लिए परमाणु उर्जा की ओर सबकी नजरें है। परमाणु उर्जा का उत्पादन रेडियोधर्मी पदार्थों से होता है। रेडियोधर्मी तत्व उर्जा के असीमित स्त्रोत होते हैं तथा इनसे प्रचुर मात्रा में उर्जा प्राप्त की जा सकती है। परमाणु उर्जा का प्रमुख स्त्रोत यूरेनियम है और इसके आइसोटोप यूरेनियम-235 की एक टन मात्रा से उतनी ही उर्जा पैदा की जा सकती है, जितनी कि 30 टन कोयले से अथवा 1 करोड़ 20 लाख बैरल पेट्रोलियम पदार्थों से। रेडियोधर्मी पदार्थो से उर्जा का असीमित भण्डार तो मिला है,परन्तु साथ ही भयावह रेडियोधर्मी प्रदूषण की सौगात भी मिली है। नब्बे के दशक में तात्कालीन सोवियत संघ के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र से हुए रेडियोधर्मी रिसाव से लाखों लोग प्रभावित हुए थे। 2011 में जापान के फुकुशिमा संयंत्र में हुई दुर्घटना ने भी तबाही मचाई थी। वर्तमान समय में समूचे विश्व में लगभग 300 परमाणु संयंत्र काम कर रहें है। और इन परमाणु संयंत्रों से रेडियोन्यूक्लाइडस का रिसाब बराबर हुआ करता है,जो कि पर्यावरण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है। परमाणु संयंत्रो से निकलने वाला कचरा भी एक बड़ी समस्या है। इस रेडियोधर्मी कचरे की सुरक्षित निस्तारण की कोई कारगर विधि आज तक विकसित नहीं हो पाई है।या तो इस कचरे को समुद्र में फेंक दिया जाता है या फिर जमीन में गाड़ दिया जाता है। ये दोनों ही विधियॉ सुरक्षित नहीं हैं और इस निस्तारण से पर्यावरणीय क्षति के साथ मानव के लिए हानिकारक जहरीला वातावरण बन रहा है।

रेडियोधर्मी विकिरण के रूप में प्रदूषण फैलने का माध्यम बनती हैं-इनसे उत्सर्जित होने वालीं अल्फा,बीटा, व गामा किरणें। अल्फा किरणें वे हीलियम नाभिक होते हैं जिनका घनत्व हाइड्रोजन की अपेक्षा चार गुना अधिक होता है। इनका विकिरण काफी घातक होता है,यदि मनुष्य काफी लंबे समय तक इनके संपर्क में रहता है तो मानव त्वचा को गला देती है।बीटा किरण नकारात्मक रूप से आवेशित कण होते हैं और इनका दीर्घकालिक संपर्क भी मानव की त्वचा को घातक रूप से झुलसा देता है। गामा किरणें विद्युत चुम्बकीय प्रकृति की तरंगें होती है।तथा सर्वाधिक शक्तिशाली भेदक होती है। जिससे ये जैविक तंतुओं पर तीव्र प्रहार करती हैं और उन्हें नष्ट कर देती है। चूॅकि रेडियोधर्मी पदार्थों से होने वाला विकिरण जीवित अवयवों के शरीर में आयनीकरण उत्पन्न करता है, जिससे अवयवों को भारी क्षति पहुॅचती है। यह अवयवों के आनुवांशिक स्तर में भी परिवर्तन लाता है।जिससे न केवल उस अवयव को बल्कि उसकी आगामी पीढ़ियों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकुल असर डालता है। स्वास्थ्य को होने वाली यह क्षति विकिरण के साथ होने वाले संपर्क की अवधि और मात्र पर निर्भर करती है। उतक,कोशिकाओं,क्रोमोसोम और डीएनए के स्तरों पर रेडियोधर्मी विकिरण असमान्यताएॅ पैदा करता है। लंबे समय तक विकिरण के संपर्क में रहने वाली मॉ एक अपाहिज बच्चे को जन्म दे सकती है। विकिरण लसिका, तिल्ली व अस्थि मज्जा के लिए खतरनाक साबित होते है और दीर्घकालिक संपर्क के कारण ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को धवस्त कर देते है। अस्थि मज्जा पर विकिरण के प्रभाव से ल्यूकेमिया सा रक्तकैंसर की बीमारी हो सकती है। रेडियोधर्मी यौगिक खाद्य श्रृंखला द्वारा सजीवों के शरीर में एकत्र होकर जैविक बहुगुणन की प्रक्रिया से बढ़ते हैं जो कि अपने खतरनाक असर को तेजी से बढ़ाते है। विकिरण से होने वाली जैविक हानियों को मापने के लिए रेम्स नामक इकाई प्रयुक्त होती है। और यदि विकिरण की मात्रा 0 से 25 रेम्स तक होती है तो इसका प्रभाव अवलोकनीय नहीं होती है। यदि इसकी मात्रा 25 से 100 होती है तो श्वेत रक्त कणिकाओं में कमी आने लगती है। यदि 100 से 200 होती है तो बालों का झड़ना, उल्टी आना शुरू हो जाता है। यदि विकिरण की मात्रा 200 से 500 होती हैं तो रक्त की नसें फट जाती हैं। 500 रेम्स से ज्यादा मात्रा मौत का कारण बन जाती है।

रेडियोधर्मी कचरा पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक होता है।लंबे समय तक इससे घातक किरणें निकलती रहती हैं। परमाणु रिएक्टरों से निकलने वाले कचरे में रेडियम, थोरियम व प्लूटोनियम होते हैं। ये तीनों पदार्थ अत्यंत जहरीले होते हैं, रेडियम का अणु 32000 साल, प्लूटोनियम 500000 तथा थोरियम कई लाख साल तक वातावरण को खतरनाक ढंग से दुष्प्रभावित कर सकता है। रेडियोधार्मी प्रदूषण से तापमान में 7 से 30 डिग्री सेल्सियस तक की कमी आ सकती है,ओजोन पर्त के क्षय दर तीव्र हो सकती है। और परमाणु विस्फोट की स्थिति में एक मीटर की गहराई तक धारती पूरी तरह जमकर बंजर हो सकती है। हड्डियों के फेक्चर के निदान के लिए एक्स- रे का उपयोग किया जाता है लेकिन ये एक्स सेंटर भी रेडियोधर्मी प्रदूषण के कारक बन रहे है। देशभर में ऐक्स रे सेंटर को नियमित करने वाली संस्था आरपी एण्ड एडी बार्क मुम्बई द्वारा निर्धारित सुरक्षा मानकों की अनदेखी इन सेंटर के आसपास रहने वाली आबादी को कैंसर जैसे रोग से ग्रसित कर रही है। अभी समय है हम रेडियोधर्मी प्रदूषण के खतरों से सचेत हो जाएॅ।