प्रदूषण के खर दूषण

प्रदूषण के खर दूषण

पर्यावरण की नाक कब की कट चुकी है। रक्तस्राव सी ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ रही है। दुनिया के पर्यावरण को तहस नहस करने वाली खर दूषण सेना अब इसे बचाने की जिम्मेदारी का पाठ गरीब और विकासशील देशों को पढ़ा रही है।

अमेरिका और यूरोप ने दुनिया के पर्यावरण को अपने युद्धों और बाजार विस्तार की लालसा से बर्बाद किया है। उनके वैज्ञानिक-विचारक हैं जो इस बर्बादी पर चिंता तो जताते हैं मगर इनके कारणों को अपनी कहानियों से छुपाते हैं। इनके पास उपदेश हैं कि कार्बन उत्सजर्न कम करो, जबकि पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा गरीबों के चूल्हों का धुआं नहीं बल्कि हैलोजन्स का उत्सर्जन है। जीवाश्म ईंधन और उद्योगों से निकले क्लोरो-फ्लोरो गैसें वायुमंडल के सुरक्षा चक्र को छेद रही हैं। वहीं बढ़ती कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा असंतुलन का प्रतीक है।

चालीस और पचास के दशक में अमेरिका द्वारा खुले द्वीपों और पानी में किए गए 216 परमाणु परीक्षणों से निकले रेडियो एक्टिव आइसोटोप्स फूड चैन में शामिल हो कर कैंसर जैसी बीमारियों का जनक बने हैं। वर्ष 1945 से 1992 के बीच अमेरिका 1054 न्यूक्लीयर टेस्ट कर चुका है। मगर इनसे उत्पन्न खतरों को इतने भोलेपन से कहानियों में तथ्यों को छुपाया गया है कि सारी तर्क क्षमता धरी रह जाती है।

ऐसा ही एक प्रसिद्ध कथ्य थायरायड कैंसर के बारे में है। आयोडीन की कमी को इसके कारणों में प्रचारित किया जाता है। आयोडीन युक्त नमक खाओ पूरी दुनिया में इसका प्रचार है। मगर कैंसर का कारण आयो‌डीन नहीं बल्कि इसका रेडियोएक्टिव आईसोटोप आइयोडीन-131 है। यह न्यूक्लीयर विस्फोटों और परमाणु रिएक्टरों में ही बनता है। हमारी थायरायड ग्रंथी अपनी जरूरत के लिए आयोडीन को सोखती है। जैसे ही वह आयोडीन के इस रेडियोएक्टिव आइसोटोप को सोखती है, इसके बीटा विकिरण से कोशिकाएं मरने लगती हैं। कोशिकाओं में म्युटेशन होता है और साथ ही कैंसर की शुरुआत। आयोडीन के सेवन पर जोर इसलिए दिया जाता है, ताकि थायारायड में आयोडीन की कमी न हो और फूड चैन के जरिए अगर रेडियोएक्टिव आइसोटोप आता भी है तो वह उसे न सोखे। इस तरह आयोडीन के बचाव की कहानी सिर्फ बचाव के लिए एक उपाय भर है, जबक‌ि कैंसर के कारण की चर्चा कोई नहीं करता। रेडियोएक्टिव आइसोटोपों की चर्चा कोई नहीं करता, जो समुद्रों में किए गए परीक्षणों से मछलियों और सी फूड में आए और इससे इंसान की फूड चैन में।

इन परमाणु परीक्षणों से सिर्फ आयोडीन के ही नहीं ऐसे सात और आइसोटोप भी फूड चैन में शामिल हुए हैं। इनमें स्ट्रोंटियम-90 ब्लड कैंसर और बोन कैंसर के लिए, ट्रीटियम फेफड़ों के केंसर के लिए, प्लूटोनियम-239 लिवर और बोनमेरो के केंसर का कारण बनता है।

सिर्फ परमाणु परीक्षण ही नहीं पेट्रोलियम और कोयले के अंधाधुंध इस्तेमाल से अमेरिका और यूरोप ने पूरी दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग के खतरे पर खड़ा किया है। अमेरिका इसमें अब भी सुधार करने को राजी नहीं है। अमेरिका के सेंटर ऑफ साइंस एंड एन्वायरमेंट की रिपोर्ट के अनुसार सीएसई के अनुसार अमरीका में वर्ष 2030 तक 76फीसदी मूल ऊर्जा पेट्रोलियम जैसे फ‌ॉसिल्स ईंधन से ही पैदा होगी जिससे कार्बन और क्लोरो-फ्लोरो गैसों का उत्सर्जन कम होने की जगह और बढ़ेगा। हालांकि अमेरिका की ओर से गत मार्च में घोषणा की गई थी कि वह 2025 तक कार्बन उत्सर्जन में 26 फीसदी तक की कटौती करेगा। दूसरी ओर वर्ष 2013 के अमरीकी जनगणना के अनुसार बीस वर्ष पहले 86 फीसदी अमरीकी दफ्तर जाने के लिए

कारों का प्रयोग करते थे और आज भी आंकड़े वही हैं।
ऐसे में अमेरिका की घोषणाएं सिर्फ विकासशील और गरीब देशों को बरगलाने के लिए हैं। इसी के प्रभाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2025 तक देश में कार्बन उत्सजर्न 33 से 35 फीसदी तक कम करने की घोषणा कर दी थी। मगर जल्द ही उन्हें इसकी हकीकत समझ आ गई और पेरिस में सोमवार को उन्होंने बड़ा ही सधा और सुलझा हुआ प्रहार किया -”जिन पश्चिमी देशों ने गत वर्षों में जीवाश्म ईंधन के बल पर तरक्की की है, उन्हें भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे। जलवायु परिवर्तन हमारे कारण नहीं हुआ है। इसका कारण ग्लोबल वार्मिंग है जो कि औद्योगिक क्रांति के दौरान जीवाश्म ईंधन के कारण पैदा हुई है।”

ग्रीन हाउस इफैक्ट यह साल सबसे गर्म माना जा रहा है। कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा पिछले आठ लाख साल में पर्यावरण में सबसे ज्यादा है। कारण भी स्पष्ट हैं। डेढ़ सौ साल पहले दुनिया में इंसान की आबादी मात्र 37 करोड़ थी, यह अब बढ़ कर 7.3 अरब हो चुकी है। सभी इंसान कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। दूसरी ओर जंगल पिछले 20 साल में ही 135 लाख हेक्टयर कम हो गए हैं। इसके अलावा इंसानों ने युद्धों में बमों और अपने विमानो तथा वहानों से जो सीओ2 पैदा की है वह अलग है। खाड़ी युद्धों में जो तेल कुएं जलाए गए उनकी अनदेखी कौन कर सकता है। अमेरिका ने इराक, अफगानिस्तान पर जो बम बरसाये उनका अध्ययन कौन करेगा।

कार्बन उत्सर्जन प्राकृत‌िक असंतुलन का नतीजा है। अमीनो ऐसिड जब जीवन के रूप में ढल रहा था तो उसने भी इसका ध्यान रखा और दो तरह की जीवन शृंखलाएं बनाईं, एक जो ऑक्सीजन लेकर कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ती हैं और दूसरी जो कार्बन डाईऑक्साइड लेकर ऑक्सीजन छोड़ती हैं। इंसानों ने कुदरत के इस संतुलन को तोड़ डाला है। ग्रीन हाउस गैसों के प्रकोप से अब जंगल ही दुनिया को बचा सकते हैं।

 

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