बालक के जीवन को सफल बनाने एवं समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं शिक्षक

बालक के जीवन को सफल बनाने एवं समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं शिक्षक

महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि ''शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।' 'महर्षि अरविंद का मानना था कि किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। इस प्रकार एक विकसित, समृद्ध और खुशहाल देश व विश्व के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। आज कोई भी बालक 2-3 वर्ष की अवस्था में विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है। इस बचपन की अवस्था में बालक का मन-मस्तिष्क एक कोरे कागज के समान होता है। इस कोरे कागज रूपी मन-मस्तिष्क में विद्यालयों के शिक्षकों के द्वारा शिक्षा के माध्यम से शुरूआत के 5-6 वर्षो में दिये गये संस्कार एवं गुण उनके सम्पूर्ण जीवन को सुन्दर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

(2) समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं शिक्षक:-

एक अच्छा शिल्पकार किसी भी प्रकार के पत्थर को तराश कर उसे सुन्दर आकृति का रूप दे देता है। किसी भी सुन्दर मूर्ति को तराशने में शिल्पकार की बहुत बड़ी भूमिका होती है। इसी प्रकार एक अच्छा कुम्हार वही होता है जो गीली मिट्टी को सही आकार प्रदान कर उसे समाज के लिए उपयोगी बर्तन अथवा एक सुन्दर मूर्ति का रूप दे देता है। यदि शिल्पकार तथा कुम्हार द्वारा तैयार की गयी मूर्ति एवं बर्तन सुन्दर नहीं है तो वह जिस स्थान पर रखे जायेंगे उस स्थान को और अधिक विकृत स्वरूप ही प्रदान करेंगे। शिल्पकार एवं कुम्हार की भाँति ही स्कूलों एवं उसके शिक्षकों का यह प्रथम दायित्व एवं कर्त्तव्य है कि वह अपने यहाँ अध्ययनरत् सभी बच्चों को इस प्रकार से संवारे और सजाये कि उनके द्वारा शिक्षित किये गये सभी बच्चे 'विश्व का प्रकाश' बनकर सारे विश्व को अपनी रोशनी से प्रकाशित कर सकें। इस प्रकार शिक्षक उस शिल्पकार या कुम्हार की भाँति होता है जो प्रत्येक बालक को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप, एक सुन्दर आकृति का रूप प्रदान कर, उसे 'समाज का प्रकाश' अथवा उसे विकृत रूप प्रदान कर 'समाज का अंधकार' बना सकता है।

(3) बालक के जीवन को सफल बनाने की आधारशिला हमें बचपन में ही रखनी चाहिए:-

एक कुशल इंजीनियर वहीं होता है जो एक भव्य इमारत या भवन के निर्माण में उसकी नींव को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हुए उसे मजबूत बनाता है। और जब किसी भवन की नींव मजबूत हो तो फिर आप उसके ऊपर बनाये जाने वाले भवन को जितना चाहें उतना ऊँचा बना सकते हैं। और इस प्रकार से बनी हुई इमारत अन्य भवनों एवं इमारतों की अपेक्षा अधिक समय तक अपने अस्तित्व को बनाये रखने में सफल होती है। ठीक इसी प्रकार से हमें बच्चों के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि आज के बच्चे ही कल अपने परिवार, समाज, देश तथा विश्व के भविष्य निर्माता बनेंगे। इसलिए हमें प्रत्येक बच्चे की नींव को मजबूत करने के लिए बचपन से ही उसे उसकी वास्तविकताओं के आधार पर भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की उद्देश्यपूर्ण एवं संतुलित शिक्षा देनी चाहिए।

(4) उद्देश्यपूर्ण शिक्षा के माध्यम से ही एक सुन्दर एवं सभ्य समाज का निर्माण संभव:-

हमें प्रत्येक बच्चे को सभी विषयों की सर्वोत्तम शिक्षा देकर उन्हें एक अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकारी बनाने के साथ ही उसे एक अच्छा इंसान भी बनाना है। क्योंकि सामाजिक ज्ञान के अभाव में जहाँ एक ओर बच्चा समाज को सही दिशा देने में असमर्थ रहता है तो वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में वह गलत निर्णय लेकर अपने साथ ही अपने परिवार, समाज, देश तथा विश्व को भी विनाश की ओर ले जाने का कारण भी बन जाता है। इसलिए प्रत्येक बच्चे को सर्वोत्तम भौतिक शिक्षा के साथ ही साथ उसे एक सभ्य समाज में रहने के लिए सर्वोत्तम सामाजिक शिक्षा तथा एक सुन्दर एवं सुरक्षित समाज के निर्माण के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय लेने के लिए सर्वोत्तम आध्यात्मिक शिक्षा की भी आवश्यकता होती है।

(5) प्रत्येक बालक को विश्व का प्रकाश बनायें:-

शिक्षक एक सुन्दर, सुसभ्य एवं शांतिपूर्ण राष्ट्र व विश्व के निर्माता हैं। शिक्षकों को संसार के सारे बच्चों को एक सुन्दर एवं सुरक्षित भविष्य देने के लिए व सारे विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना के लिए बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता के रूप में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' व 'भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51' के विचार रूपी बीज बचपन से ही बोने चाहिए। हमारा मानना है कि भारतीय संस्कृति, संस्कार व सभ्यता के रूप में 'वसुधैव कुटुम्बकम्' व 'भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51' रूपी बीज बोने के बाद उसे स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण व जलवायु प्रदान कर हम प्रत्येक बालक को विश्व नागरिक के रूप में तैयार कर सकते हैं।

(6) समाज में व्याप्त बुराईयों को समाप्त करती है उद्देश्यपूर्ण शिक्षा:-

डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण व्याख्याओं, आनंदमयी अभिव्यक्ति और हँसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को प्रेरित करने के साथ ही साथ उन्हें अच्छा मार्गदर्शन भी दिया करते थे। ये छात्रों को लगातार प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे। उनकी मान्यता थी कि यदि सही तरीके से शिक्षा दी जाए तो समाज की अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। उनका मानना था कि करूणा, प्रेम और श्रेष्ठ परंपराओं का विकास भी शिक्षा के उद्देश्य हैं। वे कहते थे कि जब तक शिक्षक शिक्षा के प्रति समर्पित और प्रतिबद्ध नहीं होता और शिक्षा को एक मिशन नहीं मानता तब तक अच्छी व उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की कल्पना नहीं की जा सकती।

(7) शिक्षकों के श्रेष्ठ मार्गदर्शन द्वारा ही धरती पर ईश्वरीय सभ्यता की स्थापना संभव:-

भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक गुणों से ओतप्रोत शिक्षकों के द्वारा ही समाज में व्याप्त बुराईयों को समाप्त करके एक सुन्दर, सभ्य एवं सुसंस्कारित समाज का निर्माण किया जा सकता है। सर्वपल्ली डा0 राधाकृष्णन भी ऐसे ही महान शिक्षक थे जिन्होंने अपने मन, वचन और कर्म के द्वारा सारे समाज को बदलने की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत की। वास्तव में ऐसे ही श्रेष्ठ शिक्षकों के मार्गदर्शन द्वारा इस धरती पर ईश्वरीय सभ्यता की स्थापना होगी।