विश्व व्यापार संगठन और सेवाओं में व्यापार का आम समझौता

विश्व व्यापार संगठन और सेवाओं में व्यापार का आम समझौता
डब्ल्यूटीओ और गैट्स (जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन सर्विसेज) जल आपूर्ति व स्वच्छता के निजीकरण में जिस पैमाने पर भूमिका निभाने जा रहे हैं, उसके सामने विश्व बैंक और एडीबी बिल्कुल फीके पड़ जाते हैं।

हालांकि विश्व बैंक और एडीबी बड़ी बेशर्मी से निजीकरण को हवा दे रहे हैं और इसके लिए वे सहायता के साथ शर्तें थोपने से भी बाज नहीं आते, मगर तब भी वे संप्रभू राष्ट्र-राज्यों की अवधारणा की सीमा के भीतर ही काम कर रहे हैं। वे कहते हैं कि उनकी नीतियाँ, तो स्वयं सरकारों से उभरती हैं और किसी पर थोपी नहीं जातीं। भारत के लिए विश्व बैंक की ग्रामीण जल आपूर्ति व स्वच्छता रिपोर्ट की प्रस्तावना में बैंक के दक्षिण एशिया क्षेत्र के मुख्य अर्थशास्त्री जॉन विलियमसन कहते हैं:

“यह देखकर अच्छा लगा कि भारतीय सहभागी रिपोर्ट की मुख्य बातों को पहले ही अपना चुके थे। यह विश्व बैंक के बारे में उस आम धारणा के एकदम विपरीत था कि बैंक पहले तय कर लेता है कि क्या करना है और फिर शर्तों के जरिए अपने निर्णय को थोपता है, और अंत में सरकार पर छोड़ देता है कि वह एक अनिच्छुक आबादी पर इसे थोपे। हालांकि यह आम धारणा एक धारणा ही है, बैंक के वास्तविक कामकाज की तस्वीर नहीं..।”

कम से कम सिद्धांत रूप में विश्व बैंक व एडीबी सरकारों का यह अधिकार मंजूर करते हैं कि वे शर्तें ठुकरा दें। इसके अलावा वे अब भी मानते हैं कि वे यह सब गरीबी हटाने या विकास के लिए कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, विश्व बैंक का अप्रैल 2002 का निजी क्षेत्र विकास रणनीति दस्तावेज़ इस तरह शुरू होता है:

“निजी क्षेत्र का विकास तरक्की को बढ़ाने, गरीबी हटाने और लोगों को अपना जीवन स्तर सुधारने में मदद देने के लिए है।”

लेकिन डब्ल्यूटीओ ऐसे बहाने नहीं बनाता। पहले वाक्य में ही डब्ल्यूटीओ अपना परिचय इन शब्दों में देता है:

“संक्षेप में, विश्व व्यापार संगठन अकेला ऐसा अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो राष्ट्रों के बीच व्यापार के वैश्विक नियमों के क्षेत्र में काम करता है। इसका प्रमुख काम यह सुनिश्चित करना है कि व्यापार जितना ज्यादा संभव हो उतना सहज, पूर्व अनुमान के अनुरूप और मुक्त रह सके।”

डब्ल्यूटीओ पूरी तरह व्यापार को बढ़ावा देने और मुक्त व्यापार की राह का हर रोड़ा हटाने के प्रति समर्पित है। चाहे ये रोड़े जनतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के राष्ट्रीय क़ानूनों व नीतियों के रूप में हों या फिर कई देशों द्वारा हस्ताक्षरित व अनुमोदित कानू्नी तौर पर बंधनकारी अंतरराष्ट्रीय संधियों द्वारा समुदायों या नागरिकों को हासिल बुनियादी अधिकारों के रूप में हों।

डब्ल्यूटीओ की इस निर्मम शक्ति का इस्तेमाल अब जल आपूर्ति के निजीकरण का दबाव बनाने में किया जा रहा है। सेवाओं में व्यापार पर आम समझौता (गैट्स) डब्ल्यूटीओ का वह हिस्सा है जो सेवाओं के क्षेत्र में लागू होता है। गैट्स के विस्तार के लिए समझौता वार्ता अभी चल रही है। पहले कदम के रूप में सभी देशों को अन्य देशों को यह बताना था कि वे उनके किन सेवा क्षेत्रों को व्यापार के लिए खुलवाना चाहते हैं और इसमें दूसरे देशों के किन कानूनों व अधिनियमों को बाधा के रूप में देखते हैं।

यह काम 30 जून 2002 तक किया जाना था। इसके बाद मार्च 2003 तक यह बताना था कि बदले में ये देश अपने यहां के किन क्षेत्रों को खोलने के लिए तैयार है। ये सारी सूचनाएं गोपनीय रखी गई हैं।

गैट्स के बारे में एक संस्था की वेब साइट कहती है:

“सबसे पहले 1994 में कायम की गई डब्ल्यूटीओ की मौजूदा गैट्स व्यवस्था फिलहाल भी काफी विस्तृत और दूरगामी असर वाली है। मौजूदा नियम सेवा क्षेत्र में व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की राह में आने वाली सभी सरकारी बाधाओं को धीरे-धीरे हटाने के लिए बनाए गए हैं। गैट्स हर कल्पनीय सेवा को शामिल करता है। इसमें पर्यावरण, संस्कृति, प्राकृतिक संसाधन, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा पर असर डालने वाली सेवाएं, परिवहन सेवाएं, डाक सेवाएं व स्थानीय निकायों की विभिन्न सेवाएं शामिल हैं। इसके नियम सेवाओं के व्यापार को प्रभावित करने वाले लगभग सारे सरकारी उपायों (श्रम कानूनों से लेकर उपभोक्ता संरक्षण तक) पर लागू होते हैं। इनमें नियमन, दिशा-निर्देश, सब्सिडी और अनुदान, लाइसेंस संबंधी मापदंड और शर्तें, बाजार में पहुंच पर प्रतिबंध, आर्थिक आवश्यकता परीक्षण और स्थानीय सामग्री संबंधी प्रावधान शामिल हैं।”

इसका मतलब यह हुआ कि अभी चल रही गैट्स बातचीत के तहत “सेवाओं के मुक्त व्यापार” में बाधा डालने वाले किसी भी सरकारी दिशा निर्देश, नीति और कानून पर न सिर्फ रोक लगेगी, बल्कि उन्हें डब्ल्यूटीओ निर्देशों व प्रावधानों के अनुसार बदलना होगा। व्यवहार में इसका मतलब यह होगा कि सरकारी कानून व नियमन निरस्त कर दिए जाएं।

जरूरत की जांच

गैट्स सरकारी नियमों पर किस तरह की पाबंदियाँ लगाएगा? एक मुख्य प्रस्ताव तथाकथित जरूरत की जांच का है। इसके तहत डब्ल्यूटीओ जांच करेगा कि कोई राष्ट्रीय कानून या नियमन (जो शायद संभवतः व्यापार पर पाबंदियाँ लगाने वाला हो) सचमुच कितना जरूरी है। इसका मतलब हुआ कि किसी कानून के उद्देश्य को पहले ‘अवैध’ मान लिया जाएगा। फिर यह प्रमाणित करने की ज़िम्मेदारी उस सरकार की होगी कि वह कानून सचमुच ‘जरूरी’ है और उस ‘उद्देश्य’ को हासिल करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। जरूरत तय करने की कसौटी यह है कि इसे ‘कम बाधक होना चाहिए।’ कम बाधक देश की जनता के लिए नहीं बल्कि व्यापार के लिए और इस पर फैसला कौन सुनाएगा? कोई अदालत या संसद नहीं बल्कि डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटारा समितियां, जहां आम नागरिक या समुदाय को सुनवाई का या अपना पक्ष रखने का कोई अधिकार नहीं है। साफ तौर पर यह राष्ट्रों की संप्रभुता और लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर डकैती है।

हालांकि जरूरत की जांच अभी गैट्स में प्रस्ताव रूप में ही है, लेकिन डब्ल्यूटीओ के दूसरे समझौतों और नाफ्टा (नार्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) जैसी अन्य मुक्त व्यापार संधियों में यह पहले से मौजूद है। नाफ्टा में जरूरत की जांच से जुड़ी एक घटना से पता चलता है कि यह कैसे काम करता है। एक पत्रकार ने लिखा है:

“अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य ने गैसोलिन एडिटिव एमबीटीई पर रोक लगा दी थी, क्योंकि यह भूजल को प्रदूषित करता है। एडिटिव के कनैडियन निर्माता ने नाफ्टा के तहत इस आधार पर अमेरिका पर दावा ठोक दिया कि भूजल के प्रदूषण को रोकने के लिए रसायन पर रोक लगाना ‘व्यापार में सबसे कम बाधक’ उपाय नहीं है। कनैडियन कंपनी ने तर्क दिया कि कैलिफोर्निया गैस स्टेशनों की हजारों टंकियों को निकालकर उनकी मरम्मत करने और एक नया बड़ा निरीक्षण तंत्र खड़ा करने का रास्ता चुन सकता था। यदि कनाडा को इस प्रदूषक रसायन का निर्यात जारी रखने की अनुमति दी जाए तो इस विकल्प की अरबों डॉलर की लागत को देखते हुए कैलिफ़ोर्निया को मजबूरन अपने भूजल की सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करना पड़ेगा। कैलिफोर्निया नाफ्टा विवाद समिति के सामने जरूरत की जांच की कनाडा की व्याख्या के खिलाफ लड़ रहा है। लेकिन डब्ल्यूटीओ द्वारा प्रस्तावित भाषा में राज्य के पास बचाव के लिए कुछ नहीं होगा।”

अगर गैट्स प्रस्ताव पारित हो गए तो जरूरत की जांच का नाफ्टा से भी ज्यादा कड़ा रूप लागू होगा, जो पानी क्षेत्र के नियमन के सरकार के अधिकार को बुरी तरह पंगु बना देगा। जब संसद के आदेश तक चुनौती की जद में होंगे, तो 73वें व 74वें संशोधनों के तहत ग्राम सभा या पंचायत या स्थानीय निकायों के अधिकार कहां लगते हैं!

देशी-विदेशी एक समान

डब्ल्यूटीओ के ‘राष्ट्रीय सलूक’ नियमों के प्रभावी हो जाने का अर्थ होगा कि विदेशी कंपनियों को भी स्थानीय कंपनियों की बराबरी पर रखना पड़ेगा। यानी सार्वजनिक सेवाओं के लिए आवंटित सरकारी धन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी मुहैया कराना होगा।

बाजार तक असीमित पहुंच

गैट्स सरकारों को बाध्य कर देगा कि वे सामाजिक या पर्यावरण संबंधी प्रभावों की परवाह किए बगैर विदेशी सेवा प्रदाताओं को बाजारों में बेरोक-टोक पहुंच बनाने दे। आज कम से कम हम बहस कर सकते हैं कि निजीकरण किया जाना चाहिए या नहीं अथवा किसी क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के लिए खोला जाना चाहिए या नहीं। लेकिन एक बार गैट्स प्रस्ताव लागू हो गए, तो सारी बहस बेमानी हो जाएगी।

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