सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी)

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सीमित देयता साझेदारी

सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी) को एक वैकल्पिक निगमित व्यवसाय साधन के रूप में देखा जाता है, जो सीमित देयता के लाभ देती हैं किंतु इसके सदस्यों को यह लचीलापन उपलब्ध होता है कि वे अपनी आंतरिक संरचना को परस्पर सहमत करार पर आधारित साझेदारी के रूप में गठित कर सकें। एलएलपी स्वरूप के परिणामस्वरूप किसी भी प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने वाले अथवा वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों से संबंधित काम करने वाले उद्यमी, प्रोफेशनल तथा उद्यम अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप वाणिज्यिक रूप से कार्यकुशल साधन गठित कर सकते हैं। इसके ढाँचे और परिचालन में लचीलेपन के फलस्वरूप, एलएलपी लघु उद्यमों के लिए तथा उद्यम पूंजी द्वारा निवेश के लिए भी उपयुक्त होगा।

यह सीमित देयता साझेदारी अधिनियम, 2008 के प्रावधानों से शासित होता है।

प्रमुख विशेषताएं :

 

  • पृथक विधिक अस्तित्व
  • सतत विद्यमानता - साझेदार की मृत्यु (अथवा जारी रख पाने में उसकी असमर्थता) के बावजूद भी इसका अस्तित्व बना रहता है। 
  • साझेदारी करार तैयार करने में लचीलापन रहता है। नामित साझेदारों के कर्तव्य और दायित्व सीमित देयता साझेदारी अधिनियम, 2008 के अनुसार होंगे।
  •   साझेदार दूसरे साझेदारों के कार्यों के लिए जवाबदेह नहीं। देयता एलएलपी में उनके अंशदान तक सीमित।
  • शेयर अंतरण प्रतिबंधित
  •   एलएलपी के गठन के लिए न्यूनतम 2 साझेदार चाहिए। अधिकतम 50।
  • वार्षिक लेखा रख-रखाव की बाध्यता 
  • केंद्र सरकार को जाँच का अधिकार 
  • कोई फर्म, प्राइवेट कंपनी या कोई गैर-सूचीबद्ध सार्वजनिक कंपनी खुद को एलएलपी में रूपांतरित कर सकती है। 
  • कंपनी अधिनियम, 1956 के प्रावधान भी शामिल किए जा सकते हैं। 
  • भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 लागू नहीं होगा।
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