मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

“जो भी परिस्थितियाँ मिलें, काँटे चुभें कलियाँ खिले,

हारे नहीं इंसान, है संदेश जीवन का यही ।”

मनुष्य का जीवन चक्र अनेक प्रकार की विविधताओं से भरा होता है जिसमें सुख- दु:खु, आशा-निराशा तथा जय-पराजय के अनेक रंग समाहित होते हैं । वास्तविक रूप में मनुष्य की हार और जीत उसके मनोयोग पर आधारित होती है । मन के योग से उसकी विजय अवश्यंभावी है परंतु मन के हारने पर निश्चय ही उसे पराजय का मुँह देखना पड़ता है ।

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

कभी कभी कम्पनी के पास निर्गमित किये गए अंशों से अधिक आवेदन प्राप्त हो जाते हैं तो कम्पनी के संचालकों द्वारा निम्न में से दो विधियाँ अपनाई जाती है

1 – आवश्यकता से अधिक आये आवेदन को वापस करना :- इस विधि में कम्पनी प्राप्त आवेदनों में से जितने अंश निर्गमन करने का प्रविवरण दिया हैं उतने आवेदनों को अंश निर्गमित करके अतिरिक्त आवेदनों को वापस कर देती है I

जर्नल लेखा

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अनुबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा

अनुबन्ध का अर्थ एवं परिभाषा

अनुबन्ध (Contract) शब्द की उत्पति लेटिन शब्द कॉन्ट्रैक्टम (Contracturm) से हुई है, जिसका अर्थ है 'आपस में मिलाना' । सामान्य शब्दों में अनुबन्ध से आशय दो या अधिक व्यक्तियों को किसी कार्य को करने अथवा न करने हेतु आपस में मिलाने वाले समझौते अथवा ठहराव से है। वैधानिक दृष्टिकोण से अनुबन्ध का अर्थ विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गयी परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है। अनुबन्ध की प्रमुख परिभाषायें निम्न प्रकार है :

(1) न्यायाधीश सालमण्ड (Salmond) के अनुसार, अनुबन्ध एक ऐसा ठहराव है जो पक्षकारों के बीच दायित्व उत्पन्न करता हैऔर उनकी व्याख्या करता है।

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

किसी राज्य अथवा सरकार द्वारा सामाजिक व्यवस्था को सुचारुरुप से संचालित करने हेतु तथा मानवीय आचरण एवं व्यवहारों को व्यवस्थित तथा क्रियान्वित करने के उद्देश्य से जो नियम बनाये जाते हैं , उन्हें 'सन्नियम' या राजनियम कहा जाता है। सालमण्ड (Salmond) के अनुसार,

कौन देता है शिक्षा?

कौन देता है शिक्षा?

भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा के स्तर से सभी इतने मायूस हैं कि। प्राथमिक स्तर पर वही अभिभावक सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। हो सकता है कि इस बात को खुले तौर पर मानने में सरकारी स्कूल के अध्यापकों को थोड़ी शर्म आए (जो पढ़ाने के नाम पर अच्छा-खासा वेतन उठाते हैं।) कि गरीब से गरीब आदमी की भी पसंद सूची में ये अंतिम पायदान पर हैं। आज विशेष रूप से स्कूल स्तर के अध्यापकों की हमारे समाज में कोई इज्जत नहीं है। समाज में गुरू के लिए कभी सम्मान का भाव रहा होगा पर आज वह महज एक वेतन भोगी है। गुरूजी के इस हाल पर बात करें उससे पहले एक नजर इन आंकडों पर जो ह

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