भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872

किसी राज्य अथवा सरकार द्वारा सामाजिक व्यवस्था को सुचारुरुप से संचालित करने हेतु तथा मानवीय आचरण एवं व्यवहारों को व्यवस्थित तथा क्रियान्वित करने के उद्देश्य से जो नियम बनाये जाते हैं , उन्हें 'सन्नियम' या राजनियम कहा जाता है। सालमण्ड (Salmond) के अनुसार,

कौन देता है शिक्षा?

कौन देता है शिक्षा?

भारत में सरकारी स्कूली शिक्षा के स्तर से सभी इतने मायूस हैं कि। प्राथमिक स्तर पर वही अभिभावक सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं जिनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। हो सकता है कि इस बात को खुले तौर पर मानने में सरकारी स्कूल के अध्यापकों को थोड़ी शर्म आए (जो पढ़ाने के नाम पर अच्छा-खासा वेतन उठाते हैं।) कि गरीब से गरीब आदमी की भी पसंद सूची में ये अंतिम पायदान पर हैं। आज विशेष रूप से स्कूल स्तर के अध्यापकों की हमारे समाज में कोई इज्जत नहीं है। समाज में गुरू के लिए कभी सम्मान का भाव रहा होगा पर आज वह महज एक वेतन भोगी है। गुरूजी के इस हाल पर बात करें उससे पहले एक नजर इन आंकडों पर जो ह

सफलता के लिय लगन है जरुरी है

सफलता के लिय लगन है जरुरी है

एक बार मशहूर वैज्ञानिक एडिसन अपनी प्रयोगशाला में किसी जरुरी शोध मेंलगे हुए थे। उनके पास ही मेज पर कई कागज रखे
थे, जिनमें
उनकी जरुरी गणना एंथीं। अचानक हवा चली और कागज प्रयोगशाला में बिखर
गए। एडिसन और उनके सहयोगी इन कागजों को समेटने मेंजुट गए। एडिसन इन्हें जोड़कर रखने
के लिए Clip ढ़ूंढ़ने लगे। क्लिप मिली तोले किन वह टेढ़़ी थी और कागजों पर सही ढ़ंग से
लग नहीं पा रही थी। एडिसन उसे सीधी
करने में लग गए। उनके साथी ने उन्हें ऐसा करता देखा तो जाकर Clip का नया पैकेट
ले आया और कागजों में Clip लगाकर रख दिया। कुछ देर

बालक के जीवन को सफल बनाने एवं समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं शिक्षक

बालक के जीवन को सफल बनाने एवं समाज के वास्तविक शिल्पकार होते हैं शिक्षक

महर्षि अरविंद ने शिक्षकों के सम्बन्ध में कहा है कि ''शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींचकर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।' 'महर्षि अरविंद का मानना था कि किसी राष्ट्र के वास्तविक निर्माता उस देश के शिक्षक होते हैं। इस प्रकार एक विकसित, समृद्ध और खुशहाल देश व विश्व के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका ही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। आज कोई भी बालक 2-3 वर्ष की अवस्था में विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आता है। इस बचपन की अवस्था में बालक का मन-मस्तिष्क एक कोरे कागज के समान होता है। इस कोरे कागज रूपी मन-मस्तिष्क म

शिक्षित होने का अर्थ

शिक्षित होने का अर्थ

चारों तरफ शिक्षा ही शिक्षा के प्रतीकों के रूप में आज हमारे पास है पिछली किसी भी सदी से ज्यादा विद्यालय हैं। हर छोटे बड़े गांव, कस्बे और शहर में हर ओर स्कूल ही स्कूल दिख जाते हैं। इस विद्या ने लोगों को डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक बना कर आजीविका या रोजी और रोटी कमा लेने का हुनर तो दिया है, लेकिन इसे हम सही अर्थों में शिक्षा नहीं दी। हम अपने बच्चों को यूरोप, अमरीका और आस्ट्रलिया भेज कर वहां भी रोटी कमाने की कुशलता ही सिखा रहे हैं, मात्र विद्या दे रहे हैं और कुछ भी नहीं। आज हम अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे रहे हैं, न ही हमारा वर्तमान में शिक्षा से कोई नाता है। हम क्या कर रहें हैं यह जानने से

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