सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी)

सीमित देयता साझेदारी

सीमित देयता साझेदारी (एलएलपी) को एक वैकल्पिक निगमित व्यवसाय साधन के रूप में देखा जाता है, जो सीमित देयता के लाभ देती हैं किंतु इसके सदस्यों को यह लचीलापन उपलब्ध होता है कि वे अपनी आंतरिक संरचना को परस्पर सहमत करार पर आधारित साझेदारी के रूप में गठित कर सकें। एलएलपी स्वरूप के परिणामस्वरूप किसी भी प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने वाले अथवा वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों से संबंधित काम करने वाले उद्यमी, प्रोफेशनल तथा उद्यम अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप वाणिज्यिक रूप से कार्यकुशल साधन गठित कर सकते हैं। इसके ढाँचे और परिचालन में लचीलेपन के फलस्वरूप, एलएलपी लघु उद्यमों के लिए तथा उद्यम पूंजी द्वारा निवेश के ल

घातक है-रेडियोधर्मी प्रदूषण ?

घातक है-रेडियोधर्मी प्रदूषण ?

ज विकास की गति के लिहाज से उर्जा की मॉग लगातार बढ़ती जा रही है।उर्जा के तमाम स्त्रोतों जैसे जल,कोयला,तेल और सौर उर्जा या तो सिकुड़ते जा रहे या फिर पर्यावरणीय दृष्टि से घातक है। ऐसी स्थिति में उर्जा की आपूर्ति की सततता के लिए परमाणु उर्जा की ओर सबकी नजरें है। परमाणु उर्जा का उत्पादन रेडियोधर्मी पदार्थों से होता है। रेडियोधर्मी तत्व उर्जा के असीमित स्त्रोत होते हैं तथा इनसे प्रचुर मात्रा में उर्जा प्राप्त की जा सकती है। परमाणु उर्जा का प्रमुख स्त्रोत यूरेनियम है और इसके आइसोटोप यूरेनियम-235 की एक टन मात्रा से उतनी ही उर्जा पैदा की जा सकती है, जितनी कि 30 टन कोयले से अथवा 1 करो

पृथ्वी पर पानी की कहानी

पृथ्वी पर पानी की कहानी

हमारी आकाशगंगा में कई ख़त्म हो रहे तारे होते हैं जो क्षुद्र ग्रह के अवशेष होते हैं.

ठोस पत्थर के गोले के तौर पर ये किसी तारे पर गिर कर ख़त्म हो जाते हैं.

तारों के वायुमंडल पर नज़र रखने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक क्षुद्र ग्रह पत्थर के बने होते हैं, लेकिन इनमें काफ़ी पानी भी मौजदू होता है.

इस नतीजे के आधार पर इस सवाल का उत्तर मिल सकता है कि पृथ्वी पर पानी कहां से आया?

'शुद्र ग्रहों में ख़ासा पानी'

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

“जो भी परिस्थितियाँ मिलें, काँटे चुभें कलियाँ खिले,

हारे नहीं इंसान, है संदेश जीवन का यही ।”

मनुष्य का जीवन चक्र अनेक प्रकार की विविधताओं से भरा होता है जिसमें सुख- दु:खु, आशा-निराशा तथा जय-पराजय के अनेक रंग समाहित होते हैं । वास्तविक रूप में मनुष्य की हार और जीत उसके मनोयोग पर आधारित होती है । मन के योग से उसकी विजय अवश्यंभावी है परंतु मन के हारने पर निश्चय ही उसे पराजय का मुँह देखना पड़ता है ।

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

आवश्यकता से अधिक आवेदन पत्र प्राप्त होने पर

कभी कभी कम्पनी के पास निर्गमित किये गए अंशों से अधिक आवेदन प्राप्त हो जाते हैं तो कम्पनी के संचालकों द्वारा निम्न में से दो विधियाँ अपनाई जाती है

1 – आवश्यकता से अधिक आये आवेदन को वापस करना :- इस विधि में कम्पनी प्राप्त आवेदनों में से जितने अंश निर्गमन करने का प्रविवरण दिया हैं उतने आवेदनों को अंश निर्गमित करके अतिरिक्त आवेदनों को वापस कर देती है I

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